Narmada Ashtakam - नर्मदा अष्टकम
प्रकाशित September 14, 2025
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नर्मदा अष्टकम का अर्थ है नर्मदा नदी की महिमा के 8  श्लोक  ये हिंदू धर्म का पवित्र स्रोत है जिसमे नर्मदा नदी की शक्तियों का गुणगान करते हुए नदी को पाप हरने वाली , मोक्षदायिनी (मोक्ष प्राप्त करवाने वाली ) और सभी का कल्याण करने वाली देवी के रूप में पूजा गया है ।
                     ॥ श्री नर्मदा अष्टकम्
श्लोक - 1 
सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम। द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम॥
कृतान्त दूत काल भूत भीति हारी वर्मदे । त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
श्लोक - 2
त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम।कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं॥
सुमसत्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक शर्मदे ।त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
श्लोक - 3
महागभीर नीर पूर पाप धूत भूतलं।ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम्॥
जगल्लये महाभये मृकुण्डुसुनु हर्म्यदे | त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
श्लोक - 4
गतं तदैव मे भयं त्वदम्बु वीक्षितं यदा।मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा॥
पुनर्भवाब्धि जनमज भवाब्धि दुख वर्मदे ।त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
श्लोक - 5
अलक्ष लक्ष किन्न रामरासुरादि पूजितं।सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षी लक्ष कूजितम्॥
वसिष्ठ शिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे। त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
श्लोक - 6
सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै:।धृतं स्वकीय मानसेषु नारदादि षटपदैः॥
रविन्दु रन्ति देव देव राजकर्म शर्मदे।त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
श्लोक - 7
अलक्ष लक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं।ततस्तु जीव जंतु तंतु भुक्ति मुक्ति दायकं॥
विरञ्चि विष्णु शंकरं स्वकीय धाम वर्मदे। त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
श्लोक - 8
अहो धृतं स्वनं श्रुतं महेशिकेश जातटे।किरात सूत वाडवेषु पण्डिते शठे नटे॥
दुरन्त पाप ताप हारि सर्वजंतु शर्मदे। त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे

फलश्रुति - नर्मदा अष्टकम् पाठ करने का लाभ

श्लोक - 8
इदं तु नर्मदाष्टकम त्रिकालमेव ये सदा।पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गतिम कदा॥
सुलभ्य देह दुर्लभं महेश धाम गौरवम्। पुनर्भवा नरा न वै विलोकयन्ति रौरवम्॥
अंतिम श्लोक में स्वर्ण अक्षरों में कहा गया है जो मनुष्य दिन में तीन बार इन श्लोकों का जाप करने लगता उसे पुण्य की प्राप्ति के साथ  नरक का दुख नहीं सहना पड़ता और उसका भाग्य चमकने लगता है
लिङ्गाष्टकम्       शीतलाष्ट्क स्त्रोतम       श्रीरुद्राष्टकम्